• June 14, 2026

नगर वधु


एंजेला का फ़ोन आया था।
वह भारत आ रही थी।
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एंजेला और मेरी मुलाकात ग्रीस में हुयी थी। डाक्यूमेंट्री फिल्म फेस्टिवल में मेरी फिल्म “काशी के रहस्य” का फिल्मांकन होना था।
फिल्म को बहुत ही सराहा गया था।एंजेला तब से मुझ से प्रभावित थी और भारत और काशी के बारे में और भी जानने को उत्सुक, एंजेला और मेरी दोस्ती प्रगाढ़ होती गयी। इस बार हम दोनों मिलकर एक और फिल्म तैयार कर रहे थे जो ३६० पुराणी काशी की परंपरा पर आधारित थी जिसकी शुरुआत राजा मानसिंघ ने करवाई थी । काशी के मणिकर्णिका श्मशान घाट में श्मशान नाथ देवता के सामने उनके गर्भगृह में चैत की सप्तमी को नगर वधुएं नृत्य प्रस्तुत करती हैं।
जलती चिताओं के सामीप्य में ये नगर वधुएं अपने घुंघरुओं से वातावरण को झंकृत कर, बाबा श्मशान नाथ से वरदान मांगती हैं कि उनका अगला जन्म अच्छा हो। चैती,भजन,फाग, और न जाने किस किस विधा की संगीत की लहरें मन्त्र मुग्ध कर देती हैं श्रोताओं को।
एक ओर जहाँ चिताओं के जलते शोक से लिप्त वातावरण सिहरन पैदा करती है, वहीँ दूसरी ओर ये नगर वधुएं मानती हैं की आज के दिन मोक्ष की प्राप्ति होती है।

सामान कोने वाले कमरे में रख कर एंजेला और मैंने बहुत सारी बातें की । भारत की न होकर भी कुछ एक अजीब सा खिंचाव था उसको यहाँ का।
वह इसका श्रेय उसके पर-दादा को देती है जो शायद भारतीय थे।
काफी शोध किया था एंजेला ने इस फिल्म के लिए। एंजेला अपना लैपटॉप खोल कर दिखाती गयी…………उत्सुकतापूर्वक, एक अभिनेत्री की तरह, अपनी आवाज़ को बनावटी बना कर पढ़ती जा रही थी……….
नगरवधू का अर्थ होता है संपूर्ण नगरवासियों की पत्नी।,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,इसे मैं प्रस्तावना के रूप में अपनी फिल्म में प्रस्तुत करूंगी….
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मैं अवाक् होकर एंजेला को सुनती जा रही थी ।
उसने ही बताया कि रति नामक नगर वधु ने पिछले वर्ष बहुत ही अच्छा नृत्य किया था।
बस फिर क्या था ? अपना वीडियो कैमरा और कुछ ज़रूरी सामान लेकर हम दोनों रति के घर की तलाश में चल पड़े।
पूछते हुए हम शिवदासपुर गली पहुंचे। बनारस में इसे “बदनाम गली” के नाम से जाना जाता है। लोगों की तीखी नज़रों से बचते बचाते हम एक ओर रुके और रति के घर का पता वहां खड़ी कुछ सजी धजी लड़कियां जो शायद नगर वधुएं ही होंगी, से पुछा।ठहाकों के बीच किसी ने हमें सही पता बताया और एक छोटे कमरेनुमा घर के सामने हमने अपने आप को पाया। दरवाज़ा खटखटाने पर एक महिला निकली।
‘रति?’ मैंने उत्सुकता से पुछा ।


‘जी हाँ’ उसने कहा और एक प्रश्न चिन्ह लिए खड़ी हुयी ।
हमने उसे अपने आने का कारण बताया तो उसने हमें अंदर आने दिया।
रति का जैसा नाम था वैसा ही रूप ! कोई ३०-३२ की होगी वो—–दुबली पतली, तीखे नयन नक्श और हल्का सांवला रंग। नाक में एक चमकती हुयी लाल मणि की लौंग जैसे उसे एक सुन्दर देवी का रूप दे रही थी । अपने घने काले बालों को गूंथ कर एक जूड़े में बाँध उसमे सेवंती का गजरा बड़े ही सलीके से सजा रखा था। उसकी मुस्कराहट अलौकिक थी ।
पता नहीं क्यों एक अपनापन सा हो गया रति से!
घर के अंदर की हालत बहुत ही नाज़ुक लग रही थी।
रति कहती जा रही थी “दीदी हम पर क्या फिल्म बनाएंगी? हमें तो लोग नीची नज़रों से देखते हैं बस सिर्फ एक दिन होता है चैत की नवरात्रि का जहाँ हमें इज़्ज़त से नृत्य करने आमंत्रित किया जाता है “
‘माँ……..’
चौंक कर देखा तो एक १५-१६ साल की लड़की सहमी सी खड़ी थी।
‘मेरी बेटी मोहिनी है ये…’ रति ने बताया कि न चाहते हुये भी मोहिनी को भी अब वही सब कुछ करना पड़ता है जो वो करती है।
मेरी आँखें भर आयीं थी। कितनी आसानी से हम सब किसी पर बदचलनी का मोहर लगा देते हैं !!
चैत के लिए अभी और समय बाकी था। रति कहने लगी कि सप्तमी के दिन मणिकर्णिका में आकर हम उसका और मोहिनी दोनों का नृत्य देख सकते हैं और जिसे अपनी फिल्म का एक हिस्सा बना सकते हैं। मुझे भी बात जाँच गयी और मैं और एंजेला घर की ओर चल पड़े
कोरोना का कहर अचानक बढ़ चला था। देखते ही देखते इस महामारी ने कई घरों को तबाह कर दिया। चारों ओर हाहाकार मचा था।
चैत की नवरात्री आ गयी ।
सप्तमी का दिन था ।
दोपहर के खाने के बाद से ही मैं और एंजेला आज के बड़े शूटिंग की तैयारी में जुट गए। मुझे विश्वास था कि ये फिल्म हमें प्रसिद्धि की चरम सीमा पर पहुंचाएगी। मैंने फिल्म का शीर्षक भी सोच रखा था। माँ-बेटी की अनोखी जुगल बंदी श्मशान के अद्भुत परन्तु भयावह वातावरण में एक ऐतिहासिक परंपरा को रूप देने जा रही थी।
शाम होते ही कई वधुएं आती नज़र आयीं। सुन्दर वेशभूषा में आज जैसे वो प्रलय लाने वाली थीं।
मेरी आँखें रति को खोज रही थीं। अचानक मोहिनी को आते देख मैं उसकी तरफ बढ़ी।
‘माँ की तबियत आज कुछ ठीक नहीं है। कुछ देर बाद आएँगी, लेकिन वो आएँगी ज़रूर।
मन कुछ उदास सा हो गया। आशंकाएं भी मन में अनजाने उठने लगीं।
मैंने और एंजेला ने एक अच्छे कोण में कैमरा रख कर पूरे दृश्य को कैद करने की तैयारी की।
शाम की आरती के साथ भजन शुरू हुआ। नृत्य की तैयारी होने लगी। मैं बार बार मोहिनी के पास जा कर रति की खबर ले रही थी। अचानक कुछ शोरगुल के साथ कुछ नगर वधुएं आती दिखीं। एक अर्थी को कन्धा देते हुए वो आ रही थीं। मोहिनी को अचानक मैंने भागते देखा। अर्थी से लिपट कर वो चीख उठी……..
‘माँ………….’
बाकी नगर वधुएं उसको संभालती हुयी कहने लगीं-
‘बेटा तुम्हारी माँ इसी मोक्ष प्राप्ति के लिए नृत्य करती थी और उसकी इच्छानुसार वैसा ही हुआ। तुम देर न करो और अपना नृत्य चालू रखो। तुम्हे भी भगवान मोक्ष देगा’
मोहिनी नृत्य करती हुयी रोती जा रही थी………….
रति की चिता और भी ज्वलंत हो रही थी…………..
मैं और एंजेला रो रो कर अपने कैमरे में कैद हो रहे इस ह्रदय विदारक दृश्य को असहाय हो देख रहे थे!