• June 14, 2026

चक्रव्यूह

अस्तित्व के इस चक्रव्यूह में मेरा अभिमन्यु फंसता गया

उतार चढ़ाव ,जीवन मरण, सुख -दुःख के भंवर में धंसता गया

अश्रु-धारा बहती गयी ,न मिला कोई  पथ निर्गम का

जो मिली थी चंद साँसे, उनमे हर्ष और शोक का संगम था

कठिनाईओं से जूझती ,पथरीली डगर में हुयी जब पंगु काया

स्तब्ध था,भाँप पाया तभी ,इस संरचना की वह माया

अधीर देह  ही है अभिमन्यु ,जो मग्न हुआ उतावलेपन में

आवेग में बेसुध,अनभिज्ञ,अज्ञानी है जीने की उलझन में

मेरी मनःस्थिति जो शिथिल पड़ी जैसे सोई सुभद्रा सी

निरर्थक आवेश ,आक्रोशित जैसे भंग हुयी निद्रा सी

न  ओर छोर  आया था  समझ बस आवर्त  था एक  अनंत  

तमस  था , न था आसान, पार  करना  था ऐसे ही जीवंत

काश उस दिन सुभद्रा  न  होती मूर्छित सी   निद्रा  में 

समझ  लेती  जीवनोपदेश , न होता  मोह भंग  तन्द्रा में 

अपनी सुभद्रा को जगा कर ,जब  मेरा अभिमन्यु होगा सनद्ध

तभी मात दे कर लौटेगा किसी चक्रव्यूह में से वह जीवित