• October 6, 2026

गद्य और पद्य

गद्य और पद्य में हुआ एक बार  घमासान

कौन अपने शब्द जाल से बनाता संपर्क आसान ?

“गद्य तुम बहुत हो वाचाल, तुम्हारी बातें होती अनंत

शब्द होते हृदय भेदी, जो बनाते वातावरण ज्वलंत”

गद्य अहंकारी बोला , “दो चार तुम्हारी पंक्तियाँ इधर उधर

कहीं अलंकार, कहीं उपमा  में बस खड़ी हो जाती बन संवर”

“मेरा है शब्दकोष विशाल, हर शब्द सम्प्रेषित करता अनोखा अर्थ

एक ही परिस्थिति को वर्णित करते मेरे अनगिनत शब्द समर्थ”

मुस्कुराती हुयी पद्य ने समझाया “अत्यल्प  शब्द होते हैं इष्ट

शब्दों के जाल न हों -बस चार शब्दों में हो अर्थ स्पष्ट”

“पद्य के शब्द श्रृंगार होते सबके हृदय में जा बस

मेरा हरेकअलंकृत, अनुभूतिमय शब्द भी होता सरल सरस”