हरी भरी वसुंधरा

हरित लता, ऊँचे तुंग, कल कल नदी बही
नव कोपल, सौंधी मिटटी ने अपनी व्यथा कथा कही
वृक्षों को काट, मनुष्य, जीवन सुखमय करने चला
स्वस्थ परिवेश का महत्त्व, वह क्या जाने अबोध भला
सूख चुकी सारी धरती, गर्म हो चला वातावरण
अब कहाँ मिलेगी छाँव तुझे, कैसे काटेगा ये जीवन
शहरीकरण की तृष्णा तुझे एक दिन करेगी नष्ट
पर्वत, सरिता ,समीर से दूर , हो गया तू पथ भृष्ट
अब भी समय है,अपनी आँखे खोल, विवेक जगा
अपने हिस्से का कर्तव्य निभा, अज्ञानता की निद्रा को दूर भगा
जल को न असंगत व्यय कर, न धरती को बना वीरान
जब हरित धरा होगी तभी होगा जीवन जीना आसान
