• June 14, 2026

मृग मरीचिका

तू एक मृग मरीचिका सा 

अप्राप्य , जैसे  काल्पनिक 

दृष्टि गोचर  होता  है 

किंतु इतनी दूर  है  कि 

तुझे पाना असंभव है 

बस दिखता है पग पग  पर 

तू  एक मायाजाल  सा 

तानाबाना मेरे अस्तित्व में 

तेरा अवास्त्विक सामीप्य भी 

दे शीतल आनन्द 

एक मृगतृष्णा उन्माद भरी

जीवन में जैसे प्राण  भरे 

पर अदृश्य हो जाये  ठग ठग  कर 

जैसे अप्रत्यक्ष, आभासी अनुभूति 

तू  एक ऐसा अहसास 

जो सम्मोहन में  बांध रखे 

हर  निमिष ,हर क्षण को

भ्रमित क़र ,मिथ्या में लिपट

फिर न जाने क्षितिज से झाँक 

मुझे वश  में  करे डग डग पर

कैसी है यह अनुभूति,है यह कैसा अनुभव !

कैसी संसक्ति , कैसा लगाव 

हृदय में तेरा अनवरत वास 

तेरी  सतत समक्षता, समीपता 

तेरा  ही सहज एक  धारा  प्रहाव 

जैसे बहता हो मानस के अंचल में 

मेरे तत्व में , राज करे मेरे रग रग पर