तुरपाई

तुरपाई कर कर बचा रखे थे जो रिश्ते
उनमें कुछ खिंचाव भी तो है
कहीं पूरी सलाई ही न उधड़ जाय
थोड़ा बहुत लगाव भी तो है!
कभी जो हंस कर गुज़रती थी ज़िन्दगी
पर कहीं खुशियों का अभाव भी तो है
ढ़ोते ढ़ोते कुछ वज़नदार कसमें
अब अस्तित्व में कसाव भी तो है!
स्नेह मरहम जो लगाया था सतही
फिर रिस उठा ,घाव ही तो है
झूठी मुस्कुराहट बहलाती आईने को
दिलों में कुछ तनाव भी तो है!
तेज़ धारों में मुश्किल हो जाता नियंत्रण
किनारा तोड़ता भावों का बहाव ही तो है
अपने से पृथक होने की ज़िद
हठीला एक अलगाव ही तो है!
यह प्रलय कहीं सब न ले डूबे
डगमगाती कमज़ोर नाव ही तो है
तुरपाई की डोर कहीं कच्ची न पड़ जाए
तुरपन का उधड़ना ,उसका स्वभाव ही तो है
