• June 14, 2026

ज (J) और  ज़(Z)  की जद्दोजेहद

एक सभा  में  एक सहेली  ने  ऐलान किया कि  वो  गज़ल  गायेगी 

तालियों  से स्वागत  हुआ 

वो  कहने   लगी 

मेरी Gajal पेश  है …..

मेरी  jindagi के jakhm सभी 

मेरे jehen को करते  हैं तार  तार 

ये  julm सहते सहते कब न जाने 

हुआ  कितनी  बार ये  दिल jaar jaar

गज़ल  की महक  आने  से पहले ही  एक चुभन  का  एहसास  देने लगी 

समझ आ गया था कि  नुक़्ता लगाना  भूल गयी है 

कोने  से एक जानी मानी कवयित्री  ने धीरे  से उसके  पास आकर  कहा 

मोहतरमा ! j के नीचे नुक़्ता लगाइये 

jindagi को ज़िन्दगी कहिये 

उन्होने अगला  शेर पढ़ा 

zab zab  किसी रोज़ यूँ  मिली  तुमसे 

ऐसा  लगा गुज़री  हूँ  किसी  anzuman से

आz न ज़ाने  कितने zमानों के बाद 

Zanzeeरों   से बंधी मेरी रूह हुयी आबाद 

कितने zulm, कितने zतन किये zaलिमों ने 

न फिर भी zuदा हो पायी तुझसे मेरी याद

सभी  लोग पेशोपेश  में  थे 

तालियाँ  तो  बजीं  किंतु सब के  चेहरे  अब overdose of नुक्ता का शिकार  थे 

कवयित्री फिर  उठ कर गयीं और उनसे कहा ज़ंजीर 

zanjeer में शुरू में नुक्ता है 

बाद में  नहीं 

और —जब , अंजुमन, जुदा  में  नुक्ता  न  लगायें 

सहेली परेशान  हो  गयी 

फिर  

arz किया 

ये   नुक़्ता  है  य़ा कोई  बला  है ?

य़ा आया  कोई  तूफां ओ  ज़लज़ला  है ?

ज़ालिम  ज़िन्दगी  ने इस कदर किया  ज़लील 

सब इस  ज़बां  की  हरकतों का  सिला है 

इसलिये  दोस्तों  नुक़्ता  लगायें किंतु  संभाल कर !!