ज (J) और ज़(Z) की जद्दोजेहद
एक सभा में एक सहेली ने ऐलान किया कि वो गज़ल गायेगी
तालियों से स्वागत हुआ
वो कहने लगी
मेरी Gajal पेश है …..
मेरी jindagi के jakhm सभी
मेरे jehen को करते हैं तार तार
ये julm सहते सहते कब न जाने
हुआ कितनी बार ये दिल jaar jaar
गज़ल की महक आने से पहले ही एक चुभन का एहसास देने लगी
समझ आ गया था कि नुक़्ता लगाना भूल गयी है
कोने से एक जानी मानी कवयित्री ने धीरे से उसके पास आकर कहा
मोहतरमा ! j के नीचे नुक़्ता लगाइये
jindagi को ज़िन्दगी कहिये
उन्होने अगला शेर पढ़ा
zab zab किसी रोज़ यूँ मिली तुमसे
ऐसा लगा गुज़री हूँ किसी anzuman से
आz न ज़ाने कितने zमानों के बाद
Zanzeeरों से बंधी मेरी रूह हुयी आबाद
कितने zulm, कितने zतन किये zaलिमों ने
न फिर भी zuदा हो पायी तुझसे मेरी याद
सभी लोग पेशोपेश में थे
तालियाँ तो बजीं किंतु सब के चेहरे अब overdose of नुक्ता का शिकार थे
कवयित्री फिर उठ कर गयीं और उनसे कहा ज़ंजीर
zanjeer में शुरू में नुक्ता है
बाद में नहीं
और —जब , अंजुमन, जुदा में नुक्ता न लगायें
सहेली परेशान हो गयी
फिर
arz किया
ये नुक़्ता है य़ा कोई बला है ?
य़ा आया कोई तूफां ओ ज़लज़ला है ?
ज़ालिम ज़िन्दगी ने इस कदर किया ज़लील
सब इस ज़बां की हरकतों का सिला है
इसलिये दोस्तों नुक़्ता लगायें किंतु संभाल कर !!
