घर वापसी

प्रवासी सा भटक रहा था, अपरिचित अंचल था
क्षोभ से भरा हुआ, कोलाहल था, मन चंचल था
सुनसान पड़ी थी मानस मरुभूमि,संघर्ष और वेदना विकल
अशांत व्याकुल था चित्त,हुआ उद्विग्न विव्हल
हृदय की स्याही जब बनी शब्द श्रृंखला
स्पंदनों को स्नेह में जकड़ पकड़ मेखला
दिशा मिली ,लक्ष्य दिखा, हुआ हर्षित अंतर्मन
शब्दों ने की जैसे पुष्पांजलि, बिखर उठे स्नेह सुमन
प्रवाह हुआ ,कविताओं की बह निकली धारा
मानो अपने ही घर में अपनों ने पुकारा
घर वापसी हुयी ,बसाया स्नेहिल शब्द संसार
अब न क्लेश था, न कोलाहल, केवल था अब प्यार.
