अलविदा

आज बीस साल बाद मैं अपने उस घर के दालान में खड़ा था जिसे मैं अलविदा कह आया था !
मेरी आँखें जो फिर आंसुओं से धुंधली हो चुकी थीं ….मेरे परिवार को ढूंढ रहीं थीं …
उस दुर्भाग्यपूर्ण दिन को मैं कभी भुला ही न सका आज तक . माँ के अलावा सभी ….मेरे दादा दादी पिता और भाई बहन …मुझे ढ़केल देना चाह रहे थे .
माँ ने लाख कोशिश की मुझे छिपाने की …रसोई के अन्दर के छोटे कमरे में …
रोती बिलखती रही वह गिड़गिड़ाती …पिताजी के पैर पड़ती रही …..उनकी गलती सिर्फ यह थी कि उन्होने मुझे ….एक किन्नर को जन्म दिया था ….
आखिर इसमे मेरी क्या गलती थी ?मैं आज तक समझ नहीं पाया था….
माँ ने मुझे उस दिन छाती से लगा रोते रोते उस टोली को सौंप दिया था …क्योंकि मेरे कारण मेरे अमीर पिता के अहन्कार को ठेस पहुँच रही थी और उनकी सामाजिक स्तिथि कमज़ोर हो रही थी …
अचानक मैने माँ को बाहर आते देखा …
बूढ़ी हो चली थी वह ….
तेज कदमों से चलकर आयीं और एक लिफाफे में कुछ रुपये डालकर मेरे साथी को पकडाकर रूँधे गले से बोलने लगी …
तुम्हें देखकर मुझे अपने बच्चे की याद आती है बेटा .. भगवान तुम्हारा भला करे ….
मुझे वह पहचान नहीं पायी थी ….
गले में एक घुटन हुई ….
एे ..एे ….चल ….दूसरे घरों में भी जाना है …..
ढ़ोलक वाला कह रहा था ….
मैं एक बार और ….अपने घर को अलविदा करता हुआ ….किन्नरों की टोली में जा मिला …
